मंडी उपचुनाव नवंबर में करवाने पर चर्चा, लेकिन तब होना असंभव है- कैसे, यहां समझें

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मंडी उपचुनाव नवंबर में करवाने पर चर्चा, लेकिन तब होना असंभव है- कैसे, यहां समझें


मंडी:
कोरोना संक्रमण और त्योहारों को मद्देनजर रखते हुए मंडी लोकसभा सीट का उपचुनाव टाल कर नवंबर में कराए जाने की चर्चा चल रही है। बता दें कि नवंबर माह में मंडी सीट पर चुनाव करवाना असंभव सी बात है।

असंभव के पीछे की ये है कहानी:

असंभव कहने के पीछे का कारण मंडी लोकसभा क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति है। संसदीय क्षेत्र के तहत आते जनजातीय क्षेत्र लाहुल स्पीति, किन्नौर व भरमौर में सर्दियों में भारी हिमपात होता है। 

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इससे तीनों हलकों के ज्यादातर प्रमुख संपर्क मार्ग बंद हो जाते हैं। मतदान केंद्र बर्फ की चपेट में आ जाते हैं। मतदान केंद्रों तक सामग्री, पोलिंग पार्टी व मतदाताओं का पहुंचना मुश्किल हो जाता है। 

15 नवंबर के बाद सरकार ही कर देती है रास्ता बंद:

15 नवंबर के बाद आधिकारिक रूप से लाहुल स्पीति के कई मार्गों पर आवाजाही बंद कर दी जाती है। लाहुल व अन्य जनजातीय क्षेत्रों में अप्रैल में बर्फ कम होती है।

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इन तमाम बिंदुओं पर गौर करने के बाद प्रतीत होता है कि अप्रैल में तीनों जनजातीय क्षेत्रों के खुलने के बाद ही यहां उपचुनाव संभव है। यहां पिछले तीन चुनाव भी अप्रैल, मई के महीने में ही हुए हैं।

केवल साढ़े चार वर्ष का होता था मंडी सांसद का कार्यकाल:

बता दें कि मंडी संसदीय क्षेत्र का कार्यकाल वर्ष 1996 तक साढ़े चार साल होता था जबकि पूरे देश का पांच वर्षों का। लाहुल-स्पीति, भरमौर व किन्नौर विधानसभा क्षेत्र इसकी बड़ी वजह थे। 

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लोकसभा का चुनाव जब भी सर्दियों के दौरान होता था, क्षेत्र के 17 में से 14 हलकों में मतदान हो जाता था। लाहुल-स्पीति, भरमौर व किन्नौर में मई में मतदान होता था। 

तब तक 14 हलकों की मत पेटियां बंद रहती थीं।तीनों जनजातीय हलकों में मतदान होने बाद ही सभी हलकों के मतों की गिनती होती थी।

एमएस गिल ने बदले यहां के नियम:

1996 में मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभालने के बाद एमएस गिल ने इस संबंध में नियम बदले थे। अब यहां के सांसद का कार्यकाल भी पांच साल होता है।

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एमएस गिल लाहुल स्पीति के उपायुक्त रहे थे। वह यहां के हालात से भलीभांति वाकिफ थे। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में अन्य हलकों के साथ मतदान करवाने का नियम बनाया था

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